तुम फिर आजाओ सपनों में…………
वो साथ हमारा वो बातें, वो कसमें, और वो वादें,
वो सब कुछ क्या एक सपना था ?
मैंने तो मुठ्ठी भींची थी, पर रेत की तरह जो निकल गया,
वो सब कुछ क्या मेरा अपना था ?
वो बातें तुम्हारी सुन सुन कर, होठों पे हंसी जो आती थी,
लगता है कई ज़माने से वो पता हमारा भूल गयी .
वो मिलना हमारा छुप छुप के, एक दूजे के सपनों में,
खोजे हैं मेरी आँखें तुमको अब परायों में और अपनों में.
वो हंसी, ख़ुशी, दर्द, और आंसू तो हमने एक दूजे के बांटे थे,
मेरे हिस्से में क्यूँ अब आंसू और दर्द ही आये हैं?
वो साथ में मिलकर के हमने जो सपने सतरंगी देखे थे ,
नयनों की सूनी सेज पे बस अब उनकी गीली राख ही बाकी है.
वो कहना तुम्हारा मैं हूँ न, आँखों में तुम्हे छुपा लूंगा,
दुनिया के सारे तानों से हर गम से तुम्हे बचा लूंगा.
वो सब कुछ गर एक सपना था जो आँख खुली और टूट गया ,
तो फिर सो जाना चाहूंगी, आजाये फिर कोई स्वपन नया.
पर अबके तुम्हे जाने न दूँगी अपनी दुनिया से अपने सपनों से,
सो जाऊंगी मैं चिर निद्रा में, जो तुम फिर आजाओ सपनों में………..